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Speeches

भारत की राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव-2022 में सम्बोधन

कुरुक्षेत्र : 29.11.2022

कुरुक्षेत्र में, अत्यंत पावन ब्रह्म-सरोवर के तट पर आयोजित, इस अंतरराष्ट्रीय गीता जयन्ती महोत्सव में शामिल होकर मुझे आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति हो रही है। यह लोक-मान्यता मुझे रोमांचित करती है कि इसी क्षेत्र में, सरस्वती नदी के तट पर, वेदों और पुराणों को लिपिबद्ध किया गया था। इसे मैं भगवान श्री कृष्ण का वरदान मानती हूं कि राष्ट्रपति के रूप में, हरियाणा की अपनी पहली यात्रा को, मुझे इस धर्म-क्षेत्र से आरंभ करने का अवसर प्राप्त हुआ है। महाभारत के वन-पर्व में इस क्षेत्र की तुलना स्वर्ग से की गई है:

ये वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे

अर्थात

जो लोग कुरुक्षेत्र में निवास करते हैं वे साक्षात स्वर्ग में वास करते हैं।

आजकल सभी देशवासी ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ मना रहे हैं। यह उल्लेखनीय है कि हमारे स्वाधीनता संग्राम को दिशा देने वाले लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी जैसे महानायकों ने, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, गीता से मार्गदर्शन प्राप्त किया था। उन्होंने गीता पर अपनी-अपनी टीकाएं भी लिखी थीं।

देवियो और सज्जनो,

मुझे बताया गया है कि यह उत्सव, वर्ष 2016 से, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जा रहा है। इस महोत्सव में सहभागिता के लिए सहयोगी देश नेपाल तथा सहयोगी राज्य मध्य प्रदेश की सरकारों और लोगों की मैं सराहना करती हूं। मुझे यह जानकर खुशी हुई है कि कई देशों के राजदूत भी इस महोत्सव में शामिल हो रहे हैं। अनेक देशों के नागरिकों ने इस महोत्सव के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए on-line registration करवाए हैं। देश के बाहर भी इस महोत्सव के आयोजन हुए हैं। अनेक रोचक माध्यमों से, गीता के अमर और जीवन्त संदेश को देश-विदेश में प्रसारित करने के प्रयासों के लिये, हरियाणा के राज्यपाल, श्री बंडारू दत्तात्रेय जी, मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल जी तथा राज्य सरकार की पूरी टीम की मैं सराहना करती हूं।

लाखों अंत्योदय परिवारों के लाभार्थियों के लिए लागू की जा रही, ‘मुख्यमंत्री स्वास्थ्य सर्वेक्षण योजना’ के प्रथम चरण का शुभारंभ करके, आज मुझे बहुत संतोष का अनुभव हुआ है। जिला सिरसा में स्थापित किए जाने वाले Medical College एवं Hospital का शिलान्यास करने को, मैं जन-सामान्य की स्वास्थ्य सेवा से जुड़ने का सुअवसर मानती हूं। ये दोनों ही कार्य, गीता में कही गई यह बात याद दिलाते हैं कि ‘सर्वभूत हिते रता:’ अर्थात ‘समस्त प्राणियों के हित में लगे हुए लोग’ भगवान के कृपा-पात्र होते हैं। जन-कल्याण को संबल प्रदान करने वाली इन दोनों परियोजनाओं के लिए, मैं राज्य सरकार की हृदय से प्रशंसा करती हूं। भारत सरकार द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार, Information Technology का प्रभावी उपयोग करके, हरियाणा में लागू किए जा रहे Open Loop Ticketing System और GPS System का शुभारंभ करके भी मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। यह व्यवस्था, गीता में बताए गए ‘योगः कर्मसु कौशलम्’, के आदर्श का उदाहरण है। यातायात तथा परिवहन को कुशलता पूर्वक संचालित करने की इस पहल के लिए मैं एक बार फिर हरियाणा सरकार की सराहना करती हूं।

देवियो और सज्जनो,

श्रीमद्-भगवद्-गीता सही अर्थों में एक अंतरराष्ट्रीय पुस्तक है। अनेक भाषाओं में गीता के कई अनुवाद हो चुके हैं। यह भारतवर्ष का सर्वाधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय ग्रंथ है। जितनी टीकाएं गीता पर लिखी गयी हैं, उतनी शायद ही किसी अन्य पुस्तक पर लिखी गई होंगी। जिस तरह योग, पूरे विश्व समुदाय को भारत की सौगात है, उसी प्रकार योग-शास्त्र गीता भी, पूरी मानवता को भारत माता का आध्यात्मिक उपहार है। गीता पूरी मानवता के लिए एक जीवन-संहिता है, आध्यात्मिक दीप-स्तंभ है।

देवियो और सज्जनो,

स्वामी विवेकानंद ने आधुनिक युग में ‘श्रेष्ठ भारत’ की छवि को देश-विदेश में स्थापित किया था। उन्होंने श्रीमद्-भगवद्-गीता पर, विस्तार से प्रवचन दिए थे। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि गीता, कायरता को छोड़ने और वीरता को अपनाने का उपदेश देती है।

हरियाणा के वीर जवानों, मेहनती किसानों और संघर्ष करने वाली बेटियों ने, गीता के उपदेश को जीवन में ढालकर, अपने-अपने कर्म-क्षेत्र में, हरियाणा का और पूरे देश का, गौरव बढ़ाया है। हरियाणा की इस यात्रा के दौरान, विभिन्न क्षेत्रों में अपना विशेष योगदान देने वाली बहनों और बेटियों से मिलने का भी मैंने निर्णय लिया है। हरियाणा की बहनें और बेटियां, भारत का तिरंगा, अंतरराष्ट्रीय मंच पर लहरा रही हैं। मुझे हरियाणा की इन बहनों और बेटियों पर गर्व है।

देवियो और सज्जनो,

गीता के विषय में एक बहुत लोकप्रिय श्लोक है:

सर्वोपनिषदो गावो, दोग्धा गोपालनंदन:

पार्थो वत्स: सुधी: भोक्ता, दुग्धं गीतामृतं महत्।

अर्थात

सभी उपनिषद् गो-माताओं की तरह हैं। उन गो-माताओं को दुहने वाले, गोपाल नन्दन श्री कृष्ण हैं। और, गीता रूपी असाधारण दूध को पीने वाले, बुद्धिमान अर्जुन हैं। इस प्रकार, यह श्लोक, सभी उपनिषदों को माता का स्थान देता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी श्रीमद्-भगवद्-गीता को ‘गीता माता’ कहते थे। गांधीजी ने कहा था, "मुझे जन्म देने वाली माता तो चली गयी, पर संकट के समय गीता माता के पास जाना मैं सीख गया हूं।”

केवल सात सौ श्लोकों की गीता में सभी वेदों का सारांश समाहित है। गीता, वेदान्त का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। गीता एक ऐसी पुस्तक है जिसमें व्यावहारिक जीवन और अध्यात्म की सभी शंकाओं के समाधान सरलता से मिल जाते हैं। यह एक complete book है। गीता के ज्ञान को समझने वाले के लिए किसी अन्य शास्त्र, किसी अन्य पुस्तक को देखने की जरूरत ही नहीं है। गीता की रचना करने के बाद वेद-व्यास ने लिखा था:

गीता सुगीता कर्तव्या, किम् अन्यै: शास्त्र विस्तरै:

अर्थात

गीता को ही ठीक से समझ लेना चाहिए। उसके बाद अन्य शास्त्रों के विस्तार में जाने की क्या जरूरत है? अर्थात कोई जरूरत नहीं है।

गीता में यह समझाया गया है कि फल की इच्छा का त्याग करना है, लेकिन, आलस्य का भी त्याग करना है। निस्वार्थ भाव से कर्मशील रहना ही सही मार्ग है। अकर्मण्यता और कामना इन दोनों का त्याग करके, कर्म करते रहने में जीवन सार्थक हो जाता है। सुख और दुख में समान रहना, लाभ और हानि को समान भाव से स्वीकार करना, सम्मान मिले या अपमान, उससे प्रभावित नहीं होना तथा सभी परिस्थितियों में अपने संतुलन को बनाए रखना, यह गीता का बहुत ही उपयोगी उपदेश है, संदेश है। ऐसे संतुलित व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ कहा गया है।

देवियो और सज्जनो,

श्रीमद्-भगवद्-गीता विपरीत परिस्थितियों में उत्साहवर्धन और निराशा में आशा का संचार करने वाला ग्रंथ है। यह जीवन-निर्माण करने वाला ग्रंथ है। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के आयोजकों से मैं यह अनुरोध करती हूं कि घर-घर में, गांव-गांव में, नगर-नगर में गीता के प्रचार और प्रसार के लिए अनवरत प्रयास करते रहें। मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहूंगी कि गीता के उपदेश को आचरण में ढालना अधिक महत्वपूर्ण है।

मैं एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव के आयोजन तथा जन-कल्याण की योजनाओं के शुभारंभ तथा शिलान्यास के लिए हरियाणा सरकार की सराहना करती हूं। सबसे तेज गति से विकास कर रहे राज्यों में शामिल हरियाणा के सभी निवासियों के उज्ज्वल भविष्य की मंगल-कामना के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देती हूं।

धन्यवाद,

जय हिन्द!

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