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Speeches

भारत के राष्‍ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्‍द का ‘महायोगी गोरखनाथ विश्‍वविद्यालय’ के उद्घाटन के अवसर पर सम्‍बोधन

गोरखपुर : 28.08.2021
भारत के राष्‍ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्‍द का ‘महायोगी गोरखनाथ विश्‍वविद्यालय’ क

सिद्ध योगियों की सर्वोच्‍च पीठ गोरखपुर में आकर, मुझे बहुत हर्ष की अनूभूति हो रही है। मुझे इस बात की विशेष प्रसन्‍नता है कि तीन वर्ष से भी कम समय में, मुझे, यहां एक महत्वपूर्ण शैक्षिक संस्‍थान के उद्घाटन के लिए, पुन: उपस्थित होने का अवसर प्राप्‍त हुआ है।

अपनी पिछली गोरखपुर यात्रा के दौरान, 10 दिसम्‍बर, 2018 को महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् के संस्‍थापक सप्‍ताह समारोह में मैंने यह विश्‍वास प्रकट किया था कि गोरखपुर को ‘सिटी ऑफ नॉलेज’ के रूप में विकसित करने का लक्ष्‍य प्राप्‍त किया जाएगा। मेरे लिए यह संतोष का विषय है कि श्री गोरक्षपीठ और महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् ने संकल्‍पपूर्वक आगे बढ़ते हुए गोरखपुर में महायोगी गोरखनाथ विश्‍वविद्यालय का निर्माण करके इस दिशा में उल्‍लेखनीय प्रगति की है।

पूरे भारत में नाथ-सिद्ध परंपरा के अनुयायियों के लिए श्री गोरखनाथ के नाम पर स्‍थापित गोरखपुर नगर अनन्य श्रद्धा का केन्द्र है। राप्ती और रोहिन नदियों के संगम पर स्थित गोरखपुर नगर तथा यह संपूर्ण अंचल महात्‍मा बुद्ध, तीर्थंकर महावीर और संत कबीर की ज्ञान-परंपरा से आलोकित है। यह धरती, गुरु गोरखनाथ से लेकर महंत दिग्‍विजय नाथ तथा महंत अवैद्यनाथ की पावन तपस्थली रही है और बाबा राघवदास, श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार, क्रांतिकारी राम प्रसाद ‘बिस्मिल’, साहित्यकार प्रेमचंद, रघुपति सहाय ‘फिराक़’ गोरखपुरी एवं विद्या निवास मिश्र की स्मृतियों से सुरभित है।

ऐसी मान्‍यता है कि महायोगी श्री गोरखनाथ स्‍वयं भगवान शिव के अवतार थे। श्री गोरखनाथ की तपस्‍थली गोरक्षपीठ, सदियों से भारत के सामाजिक-धार्मिक जागरण में विशिष्ट भूमिका निभाती रही है। भारत के स्‍वाधीनता आन्‍दोलन के दौरान, इस पीठ ने राजनीतिक पुनर्जागरण में, महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। आज के समय में भी, श्री गोरक्षपीठ जनजागरण, जनसेवा, शिक्षा और चिकित्‍सा सेवा का केन्‍द्र बनी हुई है।

श्री आदिनाथ, श्री मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गोरखनाथ की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नाथ पंथ, आज, भारत के कोने-कोने में मानवता की भलाई में जुटा हुआ है। भारत के बाहर भी यह पंथ तिब्‍बत, मंगोलिया, नेपाल, अफगानिस्‍तान, पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, श्रीलंका, म्‍यांमार और भूटान जैसे देशों में योग के प्रचार-प्रसार के माध्‍यम से लोक-कल्‍याण में लगा हुआ है।

महायोगी गोरखनाथ ने योग के माध्यम से, जन-साधारण को सशक्त बनाने का अतुलनीय उपक्रम किया था। गुरु गोरखनाथ जी एवं उनकी साधना-पद्धति का, संयम एवं सदाचार से संबंधित व्यावहारिक स्वरूप, लंबे समय से सम्माननीय बना हुआ है। गुरु की महिमा एवं श्रद्धा से ओत-प्रोत नाथ पंथ की मान्यताओं और साधनों का उपयोग विभिन्न धर्मों एवं मतों को लोकप्रिय बनाने के लिए शताब्दियों तक किया जाता रहा।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि शंकराचार्य के बाद, इतना प्रभावशाली और महिमामय महापुरुष, भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ। महायोगी श्री गोरखनाथ ने, महर्षि पतंजलि के योग दर्शन को युगानुकूल बनाकर जन-जन तक पहुंचाया। उन्होंने अपने उपदेश लोकभाषा में दिए। संवाद शैली में दिए गए उनके उपदेश, हिन्दी की प्राचीनतम धरोहरों में शामिल हैं।

देवियो और सज्जनो,

स्वामी विवेकानंद का विचार था कि कोई भी देश उसी अनुपात में उन्नत हुआ करता है, जिस अनुपात में वहां के जनसमूह में शिक्षा और बुद्धि का प्रसार होता है। उनका मानना था कि वह शिक्षा जो जन समुदाय को जीवन-संग्राम के उपयुक्त नहीं बनाती, जो उनकी चारित्र्य-शक्ति का विकास नहीं करती, जो उनमें प्राणी-दया का भाव और सिंह का साहस पैदा नहीं करती, उसे शिक्षा नहीं कहा जा सकता। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि उन्हें तो ऐसी शिक्षा चाहिए, जिससे चरित्र बने, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि का विकास हो और जिससे मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी शिक्षा के उद्देश्य के बारे में ऐसी ही परिकल्पना की गई है। इसमें कहा गया है किशिक्षा से चरित्र निर्माण होना चाहिए; शिक्षार्थियों में नैतिकता, तार्किकता, करुणा और संवेदनशीलता विकसित की जानी चाहिए और साथ ही उन्हें रोज़गार के लिए सक्षम बनाना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एक उद्देश्य, हमारे संस्थानों की पाठ्यचर्या और शिक्षाविधि में सुधार करना और छात्रों में अपने मौलिक दायित्वों एवं संवैधानिक मूल्यों, देश के साथ जुड़ाव तथा बदलते विश्व में नागरिक की भूमिका एवं उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना भी है।

शिक्षा के प्रसार के माध्‍यम से सामाजिक उत्‍थान के लक्ष्‍य को लेकर 1932 में स्थापित महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद्, उत्‍तर भारत में, विशेषकर पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में लगभग 50 शैक्षिक संस्‍थाओं का संचालन कर रही है। इसी क्रम में, आज महायोगी गोरखनाथ विश्‍वविद्यालय का लोकार्पण हुआ है। मुझे विश्वास है कि कुलाधिपति के रूप में श्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल के रूप में श्रीमती आनंदीबेन पटेल के मार्गदर्शन में, यह विश्वविद्यालय अपने ध्येय को अवश्य प्राप्त करेगा।

मुझे यह जानकर बहुत प्रसन्‍नता हुई है कि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् द्वारा संचालित संस्थाओं में, विद्यार्थियों को, अत्‍याधुनिक ज्ञान विज्ञान की शिक्षा देने के साथ-साथ उनके समग्र व्‍यक्तित्‍व के विकास पर बल दिया जाता है। उनमें भारतीय संस्‍कृति के प्रति निष्‍ठा, राष्‍ट्र के लिए त्‍याग एवं समर्पण की भावना और सामाजिक सहभागिता के गुण विकसित करने पर पूरा ध्‍यान दिया जाता है।

मुझे बताया गया है कि आज लोकार्पित किए जा रहे महायोगी गोरखनाथ विश्‍वविद्यालय में योग, आयुर्वेद, चिकित्‍सा शिक्षा, उच्‍च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा तो दी ही जाएगी; साथ ही साथ, समय की आवश्‍यकता को देखते हुए, रोजगार प्रदान करने वाले पाठ्यक्रमों का संचालन भी किया जाएगा। विश्‍वविद्यालय में जहां उच्‍चस्‍तरीय शोध को बढ़ावा दिए जाने की व्‍यवस्‍था की गई है, वहीं विद्यार्थियों की व्‍याव‍सायिक शिक्षा और कौशल विकास पर भी, विशेष ध्‍यान दिया जाएगा। प्रथम चरण में यहां नर्सिंग, फार्मेसी, पैरामेडिकल एवं आरोग्‍य से जुड़े विविध पाठ्यक्रमों का अध्‍ययन, अध्‍यापन एवं शोध कार्य किया जाएगा। आगे चलकर, एलोपैथी पद्धति से जुड़े पाठ्यक्रम भी संचालित किए जाने की योजना है। मुझे बताया गया है कि महिलाओं को आत्‍मनिर्भर बनाने के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाएंगे और कृषि पर आधारित गृह उद्योग संचालित करने के लिए किसानों को भी प्रशिक्षित किया जाएगा।

देवियो और सज्जनो,

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत का इतिहास गौरवमय रहा है। तक्षशिला में विश्व के प्रथम विश्वविद्यालय से लेकर नालंदा, उदंतपुरी, विक्रमशिला और वल्लभी के विश्वविद्यालयों की परंपरा कुछ समय के लिए धूमिल हो गई थी। परन्तु, हमारे वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और शिक्षकों ने पूरी दुनिया को अपनी मेधा एवं समर्पण-भावना से लगातार प्रभावित किया है। उन्होंने हम सभी के अंदर यह विश्वास जगाया है कि हमारे विद्यार्थी, ज्ञान व विचार की हमारी प्राचीन और सनातन परंपरा को आगे ले जाने में पूरी तरह सक्षम हैं। मुझे विश्वास है कि महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय में ऐसे ज्ञानवान विद्यार्थी तैयार किए जाएंगे, जो आत्मनिर्भर, सशक्त,स्वस्थ और कुशल भारत का निर्माण करेंगे। मैं सभी विद्यार्थियों के लिए यही मंगल कामना करता हूं कि आप सब ज्ञानवान बनें क्योंकि भगवद्गीता में कहा गया है कि-

न हि ज्ञानेन सदृशम् पवित्रम् इह विद्यते।

अर्थात् इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला, निसंदेह, अन्य कुछ भी नहीं है।

मुझे विश्वास है कि ऐसे ज्ञानवान विद्यार्थियों, समर्थ शिक्षकों और सुयोग्य प्रशासकों के सामूहिक प्रयासों से महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षा जगत में नए कीर्तिमान स्थापित करेगा।

मेरी शुभकामना है कि आप सभी के प्रयास सफल हों और गुरु गोरखनाथ की कृपा आप सब पर बनी रहे।

धन्यवाद

जय हिन्द!


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