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Speeches

भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का गोवा की स्वाधीनता की 60वीं जयंती के उपलक्ष में होने वाले समारोहों के शुभारंभ के अवसर पर संबोधन

पणजी : 19.12.2020

आज का दिन, गोवा के लिए ही नहीं बल्कि पूरे भारत के लिए विशेष रूप से स्मरणीय है। लगभग 450 वर्ष के औपनिवेशिक शासन के बाद 1961 में आज के ही दिन, गोवा को विदेशी शासन से मुक्त कराया गया था। आज, आप सब लोगों के साथ पूरा देश, गोवा के 60वें मुक्ति दिवस का उत्सव मना रहा है। विदेशी शासन से गोवा की मुक्ति के इस ऐतिहासिक अवसर पर आप लोगों के बीच आकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं आप सभी को इस गौरवपूर्ण दिवस की बधाई देता हूं।

गोवा में उपनिवेशी शासन की नींव, वास्को डी गामा के 1498 में भारत आगमन के समय पड़ गई थी। पुर्तगालियों ने 1510 में गोवा पर अधिकार कर लिया। धीरे-धीरे, वे लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं पर नियंत्रण स्थापित करने लगे। लोगों की नागरिक स्वतंत्रता छीनी जाने लगी। विरोध में आवाज उठाने वालों को जेल में बंद कर दिया जाता था। जनता का शोषण किया जाता था। स्थानीय अर्थव्यवस्था नष्ट की जा रही थी, जिसके कारण गरीबी बढ़ती जा रही थी।

गोवा की संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर पुर्तगाली शासन के विनाशकारी प्रभाव का जीवंत चित्रण, महान स्वतंत्रता सेनानी और विद्वान त्रिस्ताव दे ब्रगेंजा कुन्हा ने अपनी कालजयी कृतियों 'फोर हंड्रेड इयर्स ऑफ फॉरेन रूल' और 'द डीनेशनलाइजेशन ऑफ गोअन्स' में किया है।

देवियो और सज्जनो,

महात्मा गांधी कहा करते थे कि कश्मीर या किसी अन्य राज्य की तरह गोवा भी भारत का अंग है। भारत की एकता और अखंडता पर उन्हें अटूट विश्वास था। उनके इस विश्वास की पुष्टि, 1929 के उनके इस कथन से होती है कि हमारा देश ब्रिटिश,पुर्तगाली, फ्रांसीसी उपनिवेशों में विभाजित नहीं बना रहेगा, बल्कि एक होकर रहेगा।

गोवा की स्वाधीनता का संघर्ष काफी लंबा चला।इसका अंतिम चरण जून 1946 में शुरू हुआ, जब नागरिक स्वतंत्रता के निलंबन का विरोध करने के लिए डॉ. राम मनोहर लोहिया, अपने बहादुर साथियों के साथ गोवा में गिरफ्तार किए गए। गांधीजी की तरह, डॉक्टर लोहिया का भी यही मानना था कि गोमांतक क्षेत्र भारत का हिस्सा है। उनकी सराहना करते हुए गांधीजी ने कहा था:"हालांकि मेरी राजनीति से डॉक्टर लोहिया की राजनीति शायद भिन्न है, फिर भी मैंने उनके गोवा जाने की और वहां की पुर्तगाली हुकूमत के काले कारनामों की ओर इशारा करने की तारीफ की है। जब तक पूरा हिन्दुस्तान फिर से अपनी आज़ादी नहीं ले लेता, तब तक गोवा के निवासी अपनी आज़ादी का इंतजार कर सकते हैं। लेकिन इस तरह कोई आदमी या समाज अपनी इज्जत को खोये बिना, नागरिक स्वतंत्रता के बगैर नहीं रह सकता। डॉक्टर लोहिया ने जो मशाल जगाई है, उसे अगर गोवा वालों ने बुझ जाने दिया, तो उनका नुकसान ही होगा।”

आप सभी के पूर्वजों ने, आज़ादी की मशाल को बुझने नहीं दिया। इसे जलाए रखने के लिए, अनेक स्वाधीनता सेनानियों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। आज के इस अवसर पर, मैं आप सभी के पूर्वजों के त्याग और बलिदान का स्मरण करता हूं और उन्हें शत-शत नमन करता हूं।

देवियो और सज्जनो,

गोवा की मुक्ति का संघर्ष केवल नागरिक स्वतंत्रता के लिए नहीं था।वह, भारत के साथ फिर से एकाकार होने की चिर-संचित अभिलाषा की पूर्ति का संघर्ष भी था। इस अभिलाषा की अभिव्यक्ति, मुक्ति संघर्ष में तिरंगे के उपयोग में साफ दिखाई देती थी। राजनीतिक संघर्ष के लिए गांधीवादी मार्ग को अपनाना भी इसी भावात्मक एकता का परिचायक था।

गोवा को मुक्त कराने के लिए सभी समुदाय और संगठन औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ मिलकर लड़े। आजाद गोमांतक दल, गोवा विमोचन समिति, गोवा मुक्ति सेना और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एकजुट हो गए। फ्रांसिस्को लुइस गोमेस ने ‘गोमांत की इंडियन नेशनलिज्म’ का स्वर बुलंद किया और लुइस दे मेनेज़ेस ब्रगेंज़ा ने गोवा की स्वतंत्रता के साथ-साथ भारत के साथ एकीकरण का उद्घोष किया।

15 अगस्त, 1955 को, महान स्वतंत्रता सेनानी श्री एन.जी. गोरे के नेतृत्व में एक विशाल सत्याग्रह शुरू किया गया। गोवा के बाहर के भारतवासी, स्थानीय मुक्ति आंदोलनों का समर्थन करने के लिए हजारों की संख्या में गोवा पहुंच गए। स्वतंत्रता संग्राम में व्यापक जन भागीदारी को देखकर औपनिवेशिक शासक आश्चर्य-चकित रह गए।

विशाल जन-समर्थन को देखते हुए भारत सरकार ने भी अपने कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए, लेकिन औपनिवेशक शासक सत्ता से हटने के लिए तैयार नहीं हुए। अंतिम विकल्प के रूप में, 17 दिसंबर 1961 को 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया गया। दो दिन बाद यानि आज के दिन ही, 19 दिसंबर को गोवा के गवर्नर जनरल, मैनुअल एंटोनियो वासालो दा सिल्वा ने समर्पण कर दिया। गोवा फिर से भारत का अंग बन गया।

देवियो और सज्जनो,

गोवा की 160 किलोमीटर लंबी तट-रेखा पर, दुनिया के कुछ सबसे खूबसूरत समुद्र–तट मौजूद हैं। गोवा की प्राकृतिक सुषमा अनूठी है और यहां के लोग ‘अतिथिदेवो भव’ की परंपरा के सच्चे प्रतिनिधि हैं। मेरा अपना अनुभव भी इसी भावना की पुष्टि करने वाला रहा है। संसदीय प्रतिनिधिमंडल के संयोजक के रूप में, यहां के सुंदर समुद्री तटों और हरे-भरे वनों ने मुझे बहुत प्रभावित किया। यहां के लोगों के अतिथि-सत्कार ने मुझे हमेशा के लिए गोवा का प्रशंसक बना दिया।

गोवा के लिए यह गौरव का विषय है कि यहां के लोगों ने, समान नागरिक संहिता को अपनाया है। ऐसा करने से,यहां की सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा मिला है। गोवा के हमारे भाइयों-बहनों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और सुशासन को मजबूत करने के साथ-साथ सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखा है। जनता की सक्रिय भागीदारी वाला यह अनूठा मॉडल, गोवा के लोगों की प्रगतिशील सोच का उत्कृष्ट उदाहरण है।

देवियो और सज्जनो,

जब गोवा को आजाद कराया गया था, तब इसका आधारभूत ढांचा और उद्योग-धंधे विकसित नहीं थे। आज, गोवा जब अपनी आज़ादी के 60वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है तो यह देखकर गर्व होता है कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह राज्य पहले स्थान पर है। इसका श्रेय गोवा के मेहनती लोगों, जन-प्रतिनिधियों, जन-सेवकों तथा उद्योग क्षेत्र को जाता है।

यह उपलब्धि, कठिन प्रयासों के बल पर प्राप्त हुई है और इसमें वर्तमान एवं पूर्ववर्ती सरकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिगंबर कामत आज इस समारोह में उपस्थित हैं। राज्य की प्रगति में उनके योगदान के लिए मैं उन्हें और आप सभी को बधाई देता हूं।

आज जब पूरा देश, ‘आत्मनिर्भर भारत’ के मंत्र पर चलते हुए स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए आगे बढ़ रहा है, तब गोवा ने मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत के गतिशील नेतृत्व में ‘आत्मनिर्भर भारत, स्वयंपूर्ण गोवा’ की सराहनीय पहल शुरू की है।वे, अपने पूर्ववर्ती और आदर्श कर्मयोगी स्वर्गीय श्री मनोहर पर्रिकर की समृद्ध विरासत को सच्चे अर्थों में आगे बढ़ा रहे हैं।

गोवा के सकल घरेलू उत्पाद में औद्योगिक क्षेत्र के योगदान का प्रतिशत भारत में सबसे अधिक है। राज्य के छोटे आकार के बावजूद, यहां बड़े-बड़े उद्यमों ने निवेश किया है। गोवा अपने फार्मास्युटिकल उत्पादों की उच्च गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। कोविड-19 महामारी से युद्ध में यहां की फार्मा कंपनियों ने देश-विदेश में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है।

राज्य वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा योजना और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मजबूत बुनियादी ढांचे के कारण, महामारी के दौरान, गोवा की सरकार, लोगों की समुचित देखभाल करने में सक्षम रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी गोवा ने अच्छी प्रगति की है। एनआईटी और आईआईटी को मिलाकर यहां आठ इंजीनियरिंग कॉलेज हैं। यहां के प्रतिभाशाली युवाओं और इंटरनेट सेवाओं के योजनाबद्ध विस्तार को देखते हुए, गोवा अब इन्फोटेक कंपनियों का विकास केंद्र बनने की ओर अग्रसर है।

अपने स्वच्छ वातावरण, आसान कनेक्टिविटी और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर धरती के बल पर गोवा आज, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। भारत का अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2004 से लगातार यहां आयोजित हो रहा है। मोपा में प्रस्तावित हवाई अड्डे के बन जाने से इस पर्यटन में और बढ़ोतरी होगी।

देवियो और सज्जनो,

19 दिसंबर, 1961 का दिन,गोवा और भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। इस अवसर को अविस्मरणीय बनाने के लिए गोवा सरकार के विशेष प्रयासों की मैं सराहना करता हूं। एक वर्ष तक चलने वाले इन समारोहों की सफलता के लिए मेरी शुभकामनाएं। गोवा के उत्साही और उत्सव-प्रेमी निवासियों को एक बार फिर से बधाई।

धन्यवाद,

जय हिन्द!

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