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अभिभाषण

भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का रामायण कॉनक्लेव के उद्घाटन एवं पर्यटन तथा संस्कृति विभाग की योजनाओं के लोकार्पण / शिलान्यास कार्यक्रम के अवसर पर सम्बोधन

अयोध्या : 29.08.2021
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भारत के राष्ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्द का रामायण कॉनक्लेव के उद्घाटन एवं पर्यट

आप सब के बीच अयोध्या के इस रामकथा पार्क में आकर मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है। रामकथा के महत्व के विषय में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है:

रामकथा सुंदर करतारी,

संसय बिहग उड़ावनि-हारी।

अर्थात

राम की कथा हाथ की वह मधुर ताली है, जो संदेहरूपी पक्षियों को उड़ा देती है।

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि रामायण और महाभारत, इन दोनों ग्रन्थों में, भारत की आत्मा के दर्शन होते हैं। यह कहा जा सकता है कि भारतीय जीवन मूल्यों के आदर्श, उनकी कहानियां और उपदेश, रामायण में समाहित हैं।

मेरा मानना है कि रामायण एक ऐसा विलक्षण ग्रंथ है जो राम-कथा के माध्यम से विश्व समुदाय के समक्ष मानव जीवन के उच्च आदर्शों और मर्यादाओं को प्रस्तुत करता है। मुझे विश्वास है कि रामायण के प्रचार-प्रसार हेतु उत्तर प्रदेश सरकार का यह प्रयास भारतीय संस्कृति तथा पूरी मानवता के हित में बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

यह अयोध्या नगरी प्रभु राम की जन्मभूमि और लीलाभूमि तो है ही, बिना राम के इस नगरी की कल्पना करना भी असंभव है। राम और अयोध्या के संबंध को, संस्कृत के महाकवि भास की महान कृति ‘प्रतिमा नाटकम्’ में, भरत के संवाद द्वारा इन शब्दों में व्यक्त किया गया है:

ना-योध्या तं विना-योध्या सा-योध्या यत्र राघव:

अर्थात

राम के बिना अयोध्या, अयोध्या है ही नहीं। अयोध्या तो वही है, जहां राम हैं। इस नगरी में प्रभु राम सदा के लिए विराजमान हैं। इसलिए यह स्थान सही अर्थों में अयोध्या है।

अयोध्या का शाब्दिक अर्थ है, ‘जिसके साथ युद्ध करना असंभव हो’। रघु, दिलीप, अज, दशरथ और राम जैसे रघुवंशी राजाओं के पराक्रम व शक्ति के कारण उनकी राजधानी को अपराजेय माना जाता था। इसलिए इस नगरी का ‘अयोध्या’ नाम सर्वदा सार्थक रहेगा।

देवियो और सज्जनो,

उत्तर प्रदेश सरकार ने रामायण कॉन्क्लेव का आयोजन करके कला एवं संस्कृति के माध्यम से रामायण को जन-जन तक पहुंचाने का जो अभियान शुरू किया है इसके लिए मैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी तथा उनकी टीम के सभी सदस्यों की सराहना करता हूं। यह उत्तर प्रदेश के निवासियों के लिए सौभाग्य की बात है कि भारतीय संस्कृति के आदर्शों में रची-बसी, राज्यपाल श्रीमती आनन्दीबेन पटेल का मार्गदर्शन आप सबको प्राप्त होता है।

मुझे बताया गया है कि पिछले वर्ष आयोजित रामायण कॉन्क्लेव अत्यंत सफल रहा था। यह प्रसन्नता की बात है कि इस वर्ष, रामायण कॉन्क्लेव का आयोजन उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों में किया जा रहा है। रामायण का प्रचार-प्रसार इसलिए आवश्यक है कि उसमें निहित जीवन-मूल्य मानवता के लिए सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे।

रामायण में दर्शन के साथ-साथ आदर्श आचार संहिता भी उपलब्ध है जो जीवन के प्रत्येक पक्ष में हमारा मार्गदर्शन करती है। संतान का माता-पिता के साथ, भाई का भाई के साथ, पति का पत्नी के साथ, गुरु का शिष्य के साथ, मित्र का मित्र के साथ, शासक का जनता के साथ और मानव का प्रकृति व पशु-पक्षियों के साथ कैसा आचरण होना चाहिए, इन सभी आयामों पर, रामायण में उपलब्ध आचार संहिता, हमें सही मार्ग पर ले जाती है।

रामायण, रामचरित-मानस तथा अन्य रामकथाओं में, अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार, आप मानव के ईश्वरीकरण अथवा ईश्वर के मानवीकरण की गाथा देख सकते हैं। रामचरित-मानस में एक आदर्श व्यक्ति और एक आदर्श समाज दोनों का वर्णन मिलता है। रामराज्य में आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ आचरण की श्रेष्ठता का बहुत ही सहज और हृदयग्राही विवरण मिलता है:

नहिं दरिद्र कोउ, दुखी न दीना।

नहिं कोउ अबुध, न लच्छन हीना।।

ऐसे अभाव-मुक्त आदर्श समाज में अपराध की मानसिकता तक विलुप्त हो चुकी थी। दंड विधान की आवश्यकता ही नहीं थी। किसी भी प्रकार का भेद-भाव था ही नहीं:

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ, नर्तक नृत्य समाज।

जीतहु मनहि सुनिअ अस, रामचन्द्र के राज॥

रामायण पर आधारित और इस अयोध्या की जनभाषा में रचित रामचरित-मानस एक जन आंदोलन बन गया था। अवध क्षेत्र के घर-घर में तथा अन्य क्षेत्रों में भी मानस का पाठ-पारायण होने लगा और आज भी होता है। रामचरित-मानस की पंक्तियां लोगों में आशा जगाती हैं, प्रेरणा का संचार करती हैं और ज्ञान का प्रकाश फैलाती हैं। आलस्य एवं भाग्यवाद का त्याग करके कर्मठ होने की प्रेरणा अनेक चौपाइयों से मिलती है:

कादर मन कहुँ एक अधारा।

दैव दैव आलसी पुकारा।।

अर्थात

यह दैव तो कायर के मन का एक आधार है यानि तसल्ली देने का तरीका है। आलसी लोग ही भाग्य की दुहाई दिया करते हैं। ऐसी सूक्तियों के सहारे लोग जीवन में अपना रास्ता बनाते चलते हैं।

देवियो और सज्जनो,

सांस्कृतिक व धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षण उत्पन्न करने की दृष्टि से आज का यह आयोजन बहुत ही महत्वपूर्ण है।

भारत सरकार की स्वदेश दर्शन योजना के तहत विकसित हो रहे रामायण सर्किट से जुड़े प्रकल्पों का आज लोकार्पण हुआ है। इनसे पर्यटकों और श्रद्धालुओं को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध होंगी। आज तुलसी स्मारक भवन के विस्तार तथा नवीकरण कार्यों का शिलान्यास भी एक महत्वपूर्ण पहल है। मुझे बताया गया है कि इससे विश्व स्तर पर हो रहे रामायण एवं रामकथा से जुड़े शोध कार्यों में सहायता मिलेगी। साथ ही जन सामान्य को रामकथा से जोड़ने के कार्यक्रमों के लिए भी आधुनिक व्यवस्था की जाएगी। मुझे अवगत कराया गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित अयोध्या शोध संस्थान के तत्वावधान में एक वृहद विश्व-कोश तैयार किया जा रहा है जिसमें पूरी दुनिया में उपलब्ध रामायण व भारतीय संस्कृति से जुड़ी सामग्री का संकलन सुलभ रहेगा। यह भी प्रसन्नता की बात है कि तुलसी स्मारक भवन परिसर में विश्व के अनेक देशों में प्रचलित रामलीलाओं का अनवरत मंचन कराया जाता रहा है। इस क्रम में कोविड महामारी से व्यवधान पड़ा है, परंतु मुझे विश्वास है कि यह सराहनीय परंपरा जारी रहेगी। हमें विश्व समुदाय को, विशेषकर युवा पीढ़ी को, रामकथा में निहित जीवन-मूल्यों से जोड़ना है।

प्रिय रामकथा प्रेमियो,

आदिकवि वाल्मीकि ने राम की कथा को अपने काव्य में ऐसा जीवंत रूप दिया है कि वह सही अर्थों में राम का अयन अर्थात निवास ही है। रामायण में राम निवास करते हैं। इस अमर आदिकाव्य रामायण के विषय में स्वयं महर्षि वाल्मीकि ने कहा है:

यावत् स्था-स्यन्ति गिरय: सरित-श्च महीतले

तावद् रामायण-कथा लोकेषु प्र-चरिष्यति।

अर्थात

जब तक पृथ्वी पर पर्वत और नदियां विद्यमान रहेंगे, तब तक रामकथा लोकप्रिय बनी रहेगी।

संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण की कथा को बाद में अन्य कवियों ने अपनी-अपनी कृतियों द्वारा जन-सुलभ बनाया। रामकथा की लोकप्रियता भारत में ही नहीं बल्कि विश्वव्यापी है। उत्तर भारत में गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित-मानस, भारत के पूर्वी हिस्से में कृत्तिवास रामायण, दक्षिण में कंबन रामायण जैसे रामकथा के अनेक पठनीय रूप प्रचलित हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने इसी क्षेत्र की भाषा अवधी में रामचरित मानस की रचना करके रामकथा को जन-जन से जोड़ दिया। रामायण पर आधारित कविताएं, भजन, कहानियां, नाटक और गद्य काव्य लगभग सभी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अनेक विदेशी भाषाओं में भी उपलब्ध हैं।

देवियो एवं सज्जनो,

विश्व के अनेक देशों में रामकथा की प्रस्तुति, रामलीला के आयोजन द्वारा की जाती है। इन्डोनेशिया के बाली द्वीप की रामलीला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मालदीव, मारिशस, त्रिनिदाद व टोबेगो, नेपाल, कंबोडिया और सूरीनाम सहित अनेक देशों में प्रवासी भारतीयों ने रामकथा व रामलीला को जीवंत बनाए रखा है। इसके अलावा रामकथा पर आधारित चित्रकारी व अन्य कलाकृतियां भी विश्व के अनेक भागों में देखने को मिलती हैं। रामकथा प्रेमी प्रवासी भारतीयों ने मारिशस में ‘इंटरनेशनल रामायण सेंटर’ की स्थापना की है। वहां हर आयु वर्ग के लोगों को रोचक तरीके से रामायण को समझने और आनंद लेने की सुविधाएं स्थापित की गई हैं।

इस प्रकार रामकथा का साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव मानवता के बहुत बड़े भाग में देखा जाता है। भारत ही नहीं विश्व की अनेक लोक-भाषाओं और लोक-संस्कृतियों में रामायण और राम के प्रति सम्मान और प्रेम झलकता है। यहां तक कि पिछली पीढ़ियों में ऐसे अनेक लोग रहे जो स्कूली शिक्षा से वंचित होते हुए भी रामकथा पर गहरी रुचि व ज्ञान से परिपूर्ण होते थे। और वे समाज का मार्गदर्शन करते थे।

मैं तो समझता हूं कि मेरे परिवार में जब मेरे माता-पिता और बुजुर्गों ने मेरा नाम-करण किया होगा तब उन सब में भी संभवतः रामकथा और प्रभु राम के प्रति वही श्रद्धा और अनुराग का भाव रहा होगा जो सामान्य लोकमानस में देखा जाता है।

देवियो और सज्जनो,

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि इसी वर्ष जुलाई में थाईलैंड की राजकुमारी द्वारा दिल्ली में थाई-रामायण ‘रामकिएन’ का विमोचन किया गया। यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य माना जाता है कि अयोध्या-पुत्री राजकुमारी सूरि-रत्ना, कोरिया के महाराजा की पत्नी के रूप में, प्रथम शताब्दी में वहां की महारानी बनी थी। सूरि-रत्ना को कोरिया में क्वीन हियो के नाम से जाना जाता है। सन 2018 में दक्षिण कोरिया गणराज्य की प्रथम महिला ने अयोध्या में आयोजित दीपोत्सव समारोह में भाग लिया और उनके स्मारक के भूमिपूजन का शुभारंभ भी किया। मुझे बताया गया है कि लगभग पांच करोड़ की आबादी वाले दक्षिण कोरिया में 60 लाख से अधिक लोग स्वयं को महारानी सूरि-रत्ना का वंशज मानते हैं और अयोध्या को अपनी ननिहाल के रूप में देखते हैं। रामायण की कथा के अनुसार नेपाल से भी राजा जनक का संबंध स्थापित होता है। इस तरह अयोध्या व रामायण अनेक देशों के साथ हमारे सम्बन्धों को सांस्कृतिक शक्ति प्रदान करते हैं।

पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में रामायण तथा भारतीय संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता है। थाईलैंड के एक शहर का नाम अयुत्थया है जो अयोध्या का ही थाई रूप माना जाता है। अनेक विद्वानों ने मध्य व उत्तर-पूर्व एशिया सहित मिस्र तथा विश्व के अन्य क्षेत्रों में रामायण की कथा से जुड़ी कलाकृतियों, शिलालेखों और चित्रों का उल्लेख किया है।

देवियो और सज्जनो,

रामायण में राम-भक्त शबरी के प्रसंग से हम सभी परिचित हैं। उसकी प्रस्तुति हमने कुछ देर पहले यहां देखी है। वह प्रसंग सामाजिक समरसता का अनुपम संदेश देता है। महान तपस्वी मतंग मुनि की शिष्या शबरी और प्रभु राम का मिलन, एक भेद-भाव-मुक्त समाज व प्रेम की दिव्यता का अद्भुत उदाहरण है। इसी प्रकार, निषादराज के साथ प्रभु राम का गले मिलना और उन दोनों का मार्मिक संवाद, समरसता, सौहार्द और प्रेम की उत्कृष्टता का अनुभव कराता है। अपने वनवास के दौरान प्रभु राम ने युद्ध करने के लिए अयोध्या और मिथिला से सेना नहीं मंगवाई। उन्होंने कोल-भील-वानर आदि को एकत्रित कर अपनी सेना का निर्माण किया। अपने अभियान में जटायु से लेकर गिलहरी तक को शामिल किया। आदिवासियों के साथ प्रेम और मैत्री को प्रगाढ़ बनाया। प्रभु राम द्वारा ऐसे समावेशी समाज की रचना, सामाजिक समरसता व एकता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जो हम सबके लिए आज भी अनुकरणीय है।

सार्वजनिक जीवन में प्रभु राम के आदर्शों को महात्मा गांधी ने आत्मसात किया था। वस्तुतः रामायण में वर्णित प्रभु राम का मर्यादा-पुरुषोत्तम रूप प्रत्येक व्यक्ति के लिए आदर्श का स्रोत है। गांधीजी ने आदर्श भारत की अपनी परिकल्पना को रामराज्य का नाम दिया है। बापू की जीवन-चर्या में राम-नाम का बहुत महत्व था। वर्ष 2019 में, गांधी जी द्वारा स्थापित ‘हरिजन सेवक संघ’ के दिल्ली परिसर में एक विशेष रामकथा आयोजित हुई थी, जिसे ‘मानस हरिजन कथा’ का नाम दिया गया था। मुझे उस आयोजन में सम्मिलित होने का अवसर मिला था। ऐसे आयोजन सामाजिक समरसता की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं।

मैं कामना करता हूं कि जिस प्रकार रामराज्य में सभी लोग दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्त थे उसी प्रकार हमारे सभी देशवासी सुखमय जीवन व्यतीत करेंगे। कोविड महामारी के प्रकोप का सामना करती हुई मानवता के लिए हमारी परंपरा में प्रचलित यह प्रार्थना और भी प्रासंगिक हो गई है:

सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे सन्तु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

मा कश्चित् दुःख-भाग् भवेत्

अर्थात

सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का ध्यान भलाई पर रहे और कोई भी दुख का भागी न बने।

मैं आशा करता हूं कि केंद्र व राज्य सरकारों तथा इस क्षेत्र की जनता के प्रयासों के बल पर अयोध्या नगरी भविष्य में मानव सेवा का एक उत्कृष्ट केंद्र बनेगी, सामाजिक समरसता का उदाहरण प्रस्तुत करेगी, नैतिक व आध्यात्मिक संस्कारों के लिए प्रसिद्ध होगी तथा शिक्षा व शोध का प्रमुख वैश्विक केंद्र बनेगी।

देवियो और सज्जनो,

इस रामायण कॉन्क्लेव की सार्थकता सिद्ध करने हेतु यह आवश्यक है कि राम-कथा के मूल आदर्शों का सर्वत्रप्रचार-प्रसार हो तथा सभी लोग उन आदर्शों को अपने आचरण में ढालें। समस्त मानवता एक ही ईश्वर की संतान है, यह भावना जन-जन में व्याप्त हो, यही इस आयोजन की सफलता की कसौटी है। इस सन्दर्भ में, रामचरित मानस की एक अत्यंत लोकप्रिय चौपाई का, मैं उल्लेख करना चाहूंगा:

सीय राममय सब जग जानी,

करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।

इस पंक्ति का भाव यह है कि हम पूरे संसार को ईश्वरमय जानकर सभी को सादर स्वीकार करें। हम सब, प्रत्येक व्यक्ति में सीता और राम को ही देखें। राम सबके हैं, और राम सब में हैं। आइए, हम सब इस स्नेहपूर्ण विचार के साथ अपने दायित्वों का पालन करें। मेरी शुभकामना है कि रामायण के प्रचार-प्रसार से जुड़े आप सबके सभी प्रयास सफलतापूर्वक सम्पन्न हों।

धन्यवाद,

जय हिन्द!


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