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Speeches

भारत के राष्‍ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्‍द जी का लोक सभा के अध्‍यक्षीय शोध क़दम की तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर सम्‍बोधन

नई दिल्‍ली : 24.07.2018
भारत के राष्‍ट्रपति, श्री राम नाथ कोविन्‍द जी का लोक सभा के अध्‍यक्षीय शोध क&#23

1. अध्यक्षीय शोध क़दम- S.R.I. की तीसरी वर्षगांठ पर आयोजित समारोह के लिए आज यहां आपके बीच आकर मुझे प्रसन्नता हो रही है। मैंअध्यक्षीय शोध क़दम के साथ जुड़े सभी लोगों को और उन संसद सदस्यों को बधाई देता हूंजिन्होंने इसकी सुविधाओं का लाभ उठाया है। एक अनुभवी और लगनशील सांसद होने के नाते लोक सभा अध्यक्ष ने संसदीय लोकतंत्र को मज़बूत करने वाले अध्यक्षीय शोध क़दम की संकल्‍पना की। तीन वर्ष पहले 23 जुलाई, 2015 को इसकी स्‍थापना के बाद से वे लगातार इसे पुष्‍ट करती रही हैं। भारत के संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में उन्‍होंने एक नया अध्‍याय जोड़ा है। इसके लिए मैं उन्‍हें विशेष रूप से बधाई देता हूं।

2. लोकतंत्र में संसद और विधानमंडलों की भूमिका Discuss, Debate और Decide करने की होती है। कभी-कभी ऐसे अवसर भी आते हैं जब इस प्रक्रिया में Dissent का तत्व भी जुड़ जाता है। लेकिन Dissent की अभिव्‍यक्‍ति में भी विधायकों और सांसदों को Decorum बनाए रखना होता है। इन पांचों अर्थात् Discussion, Debate, Dissent, Decorum और Decision के मेल से ही सबसे बड़ी अर्थात् Democracy सही मायनों में लोक-कल्‍याण की अपनी भूमिका का सम्‍यक् निर्वहन कर पाती है।

3. लोकतंत्र की भव्यता को बनाए रखने और संसद एवं राज्‍य विधानमंडलों के सुचारु संचालन के लिए केवल इस बात का ही महत्व नहीं है कि वहां जन-सामान्‍य के सरोकारों पर निर्णय लिए जाएंबल्कि यह भी आवश्यक है कि इनमें सुविचारित निर्णय यानि कि well considered decisions लिए जाएं। यहीं से शोध और विवेचना की भूमिका शुरू होती है। इनकी सहायता से संसद और राज्‍य विधानमंडलों में जनता की भलाई और तरक्‍की के मुद्दों पर सही तरीके से चर्चा हो पाती है। समकालीन मुद्दों के बारे में सांसदों को सही जानकारी देकर और विषयों की बारीक़ियों से अवगत करा कर ऐसी सुविचारित कार्यवाही को सुगम बनाने की पहल S.R.I.ने की है।

4. लोक सभा या राज्य विधान सभा का सदस्य एक साथ अनेक भूमिकाएं निभाता है। एक ही समय में जहां वह राजनीतिक कार्यकर्ता और किसी दल से जुड़ा व्यक्ति होता हैवहीं अपने निर्वाचन क्षेत्र का और लाखों मतदाताओं तथा नागरिकों का प्रतिनिधि होता है। वहदेश की नीतियों और प्राथमिकताओं को कानूनी रूप देने में सहायता करने वाला विधि-निर्माता भी होता है। उस पर हर समय भारी दबाव रहता है। जिन मतदाताओं का वह प्रतिनिधित्‍व करता है, उनकी संख्‍या बहुत बड़ी होती है। हमारे कुछ निर्वाचन क्षेत्र तो भौगोलिक रूप से इतने विस्‍तृत और इतनी जनसंख्या वाले हैं कि उनकी तुलना विश्‍व के अनेक राष्‍ट्रों से की जा सकती है। ऐसी स्‍थिति मेंसंभवत: बहुत से सांसदों को अपनी जिम्‍मेदारियों को पूरा करने के लिए दिन के 24 घंटे भी पर्याप्‍त नहीं लगते होंगे।

5. किसी संसद सदस्य के विभिन्न दायित्वों को अलग-अलग खांचों में रख पाना भी संभव नहीं है। कोई भी सांसद यह तर्क नहीं दे सकता कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के केवल उन मतदाताओं की समस्याओं और चिंताओं पर ध्यान केन्‍द्रित करेगा जिन्‍होंने उसे चुन कर उसे भेजा है क्‍योंकि संसद में वह उन लोगों का भी प्रतिनिधित्‍व करता है जिन्‍होंने उसे अपना मत नहीं दिया है। और ऐसा भी नहीं है कि कोई भी सांसदसदन में रखे जाने वाले विधेयकों और नए कानूनों से बेपरवाह बना रहे। परस्पर निकटता से जुड़ी आज की वैश्‍वीकृत दुनिया में इस प्रकार का विकल्प व्‍यवहारिक नहीं है।

6. हम आजकल एक inter-connected दुनिया में रह रहे हैं। अब वैश्विक और स्थानीय सरोकारों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। कभी ऐसा भी हो सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय व्‍यापारिक स्‍थिति या व्यवस्था में कोई ऐसा बदलाव हो रहा हो, जिसका गहरा असरवस्त्र निर्माण करने वाले किसी नगर - जैसे कि तमिलनाडु या महाराष्‍ट्र के किसी नगर के लोगों की खुशहाली और अर्थव्यवस्‍था पर पड़ने वाला हो। वहीं दूसरी ओरजलवायु परिवर्तन के विरुद्ध चल रही अंतरराष्ट्रीय कशमकश में कोई ऐसा बदलाव सामने आ सकता है जिसका गंभीर प्रभाव पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश या केरल के तटवर्ती जन-जीवन पर या हरियाणा, राजस्‍थान, उत्‍तर प्रदेश या बिहार में खेती-बाड़ी पर होने जा रहा हो। अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप जैसे सुदूर टापुओं पर जलवायु परिवर्तन के असर को भी ध्‍यान में रखना होता है।

7. ये तो केवल कुछ उदाहरण मात्र हैं। वास्‍तविकता मेंऐसी अनेकानेक स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि अंतरराष्ट्रीय संधियोंराष्ट्रीय कानूनों और स्थानीय निर्वाचन क्षेत्र तक की चुनौतियों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसके कारण संसद सदस्यों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। इन परिस्‍थितियों मेंअध्यक्षीय शोध क़दम जैसी पहलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

8. अध्यक्षीय शोध क़दम के माध्‍यम से संसद सदस्यों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के विभिन्न प्रकार के विषयों पर अनुसंधान सामग्री प्राप्त होती है।S.R.I. सतत विकास लक्ष्यों; नदियों को आपस में जोड़ने; जल संसाधनों का प्रबंधन करनेसंविधान की संकल्पना के अनुसार हमारी राजनीतिक व्यवस्था के संघीय ढांचे के कार्यकरण; बच्चों में कुपोषण और उनके विकास-अवरोध के बारे में; सहवर्ती चुनावों के संबंध मेंशिक्षा प्रणाली में सरकारी और निजी क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों पर कार्यशालाएंवार्ताएं और ऐसे ही अन्य कार्यक्रमों का आयोजन करती रही है। अलग-अलग विषय-क्षेत्रों से जुड़े इन मुद्दों पर विषय-विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया है। मैंने केवल कुछ ही विषय गिनाए हैं।ऐसे अन्य अनेक विषय हैं, जिन पर इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं।

9. संसद सदस्यों के पास समय बहुत सीमित होता है; इसलिए यह आवश्‍यक है कि उन्‍हें संबंधित विषयों पर हर संभव जानकारी शोधपूर्वक उपलब्ध कराई जाए;संगत मुद्दों के बारे में उन्‍हें निष्पक्ष जानकारी इस प्रकार दी जाए कि किसी मुद्दे विशेष के सभी पहलुओं से वे पूरी तरह से अवगत हो सकें। पूरी दुनिया में विधि-निर्माताओं को विस्तृत पुस्तकालय और शोध सेवाएं उपलब्‍ध होती हैं। मुझे 12 वर्ष तक राज्यसभा का सदस्‍य रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ है और इस दौरान मुझे भी अपनी संसदीय जिम्‍मेदारियों के निर्वहन के लिए शोध की जरूरत होती थी। इसके लिए मैंने संसद पुस्तकालय तथा अन्‍य संस्‍थानों का उपयोग किया। अबसांसदों की इस जरूरत को पूरा करने के लिए एक बेहतर व्‍यवस्‍था के रूप में अध्यक्षीय शोध क़दम की सुविधाएं उपलब्‍ध कराकर लोक सभा अध्‍यक्ष ने लोकतंत्र की एक महत्‍वपूर्ण जरूरत पूरी कर दी है। मुझे विश्‍वास है कि प्रत्‍येक सांसद देश-हित में और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में अपनी संसदीय जिम्‍मेदारियों के निर्वहन में इसका अधिक से अधिक उपयोग करेगा।

10. लोकसभा अध्यक्ष ने स्वयं यह सुझाव दिया है कि यदि अध्यक्षीय शोध क़दम से प्राप्त अनुभवों की तर्ज पर राज्य विधानसभाओं में भी ऐसी ही पीठों की शुरुआत हो जाए, तो यह पहल बहुत फलदाई सिद्ध होगी। ऐसा होने से हमारे संसद सदस्यों की तरह ही राज्‍य विधानमंडलों के सदस्यों को भी इससे लाभ उठाने का अवसर प्राप्त होगा। इस संदर्भ में मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में विधान सभा सदस्यों की सहायता के प्रयास के तौर पर, गुवाहाटी में S.R.I. की क्षेत्रीय शाखा की शुरुआत जल्दी ही हो रही है। मुझे बताया गया है कि अन्य राज्य विधानमंडलों ने भी अपने स्तर पर इस प्रकार की क्षेत्रीय शाखाएं खोलने में रुचि दिखाई है।

11. संसदीय लोकतंत्र की अभीष्‍ट सफलता के लिए यह आवश्‍यक है कि सभी संसद सदस्‍य एक दूसरे के विचारों का आदर करें और परस्‍पर मर्यादा बनाए रखें। यह भी जरूरी है कि वे अपने साथी सांसदों की बातों को उचित सम्मान दें। भारत के संविधान में राष्‍ट्रपति संसदीय परिवार का अभिन्‍न अंग होता है। उस नाते मैं आप सब का ध्‍यान इस बात की ओर दिलाना चाहता हूं कि संसद की कार्यवाही का सजीव प्रसारण होता है। जनता इस प्रसारण को देखती भी है और इससे प्रेरणा भी प्राप्‍त करती है। संसद में जनता की कठिनाइयों के समाधान पर, देश के विकास की योजनाओं पर चर्चा हो, ऐसी अपेक्षा जनता को होती है। जन-प्रतिनिधि होने के नाते, जनता की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में प्रयास करने की जिम्‍मेवारी आप सब पर है। हमारा आचरण इस के अनुरूप होने में ही लोकतंत्र की मर्यादा है। मुझे आशा है कि S.R.I. जैसी संस्‍थाओं की सहायता से हमारे सांसद और विधान सभा सदस्य अपनी सम्‍यक् जिम्‍मेदारी का बेहतर निर्वहन कर सकेंगे।

12. अंत मेंएक बार फिर मैं, S.R.I. की टीम में शामिल सभी interns और fellows की और लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन की सराहना करता हूं कि उन्होंने संसद सदस्यों की शोध सहायता के उत्कृष्ट मंच के रूप में S.R.I. की स्‍थापना की। मुझे विश्‍वास है कि उनकी यह पहल सार्थक होगी और इससे हमारी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था और मज़बूत होगी।

धन्यवाद!

जय हिन्‍द!

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