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Speeches

भारत के राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविन्द जी का ‘देहदानियों का उत्सव’ समारोह के अवसर पर संबोधन

राष्ट्रपति भवन ऑडोटोरियम : 10.11.2017
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भारत के राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविन्द जी का ‘देहदानियों का उत्सव’ समारोह के अव

1.आज का यह समारोह कोई शासकीय या परंपरागत समारोह नहीं बल्कि संवेदनाओं से भरा,दिल को छूने वाला,व्यक्ति की आत्मा को झकझोरने वाला कार्यक्रम है। मैं उन सभी मानव धर्म के पालन करने में,अपनी देह का दान कर,नया जीवन देने वाले व्यक्तियों का अभिनन्दन करता हूं। देह दान कर दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने का यह सराहनीय कार्य हमें अपनी कर्तव्यपरायणता का बोध करता है।

2.देह-अंग दान करना हमने किसी अन्य देश या संस्कृति से नहीं सीखा। अपितु यह हमारी प्राचीन सभ्यता का अभिन्न अंग रहा है। त्याग,समर्पण व नया जीवन देने के ये मूल्य हमारी परंपरा की सौगात हैं। महर्षि दधिची ने अपने देह-अंगों का दान दिया था ताकि देवता उनकी हड्डियों से वज्र बना सकें और असुरों को हरा सकें। मैं महर्षि दधिची के नाम से प्रेरित,दधीची देह अंग समिति को उनके देह-अंग दान के प्रति जागरूकता फैलाने के कार्य के लिए बधाई देता हूं।

3.मानव कल्याण हेतु देह-अंग दान कर चुके एवं भविष्य में अंग दान करने का निर्णय लेने वाले व्यक्तियों का संकल्प एवं निष्ठा, हमारी सभ्यता में पले संस्कारों का चित्रण है। हमारे जीवनकाल में या हमारी मृत्यु के बाद हमारा शरीर या शारीरिक अंग किसी और मनुष्य के उपचार के लिए उपयोगी हो सके,यह सोच हमारे समाज व देश की आने वाली पीढ़ी को एक मानवीय दृष्टिकोण प्रदान करेगी।

4.हमारे शरीर के कई अंग जैसे कि लीवर, किडनी,हृदय,फेफड़े,आंत,आंखे,हड्डी,त्वचा आदि हम दान करते आये हैं। हमारा देह दान का संकल्प वैज्ञानिकों व चिकित्सा जगत हेतु ज्ञान का नया मार्ग प्रशस्त करेगा। साथ ही समाज में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के प्रति कर्त्तव्य,देश में मानवीय मूल्यों की अवधारणा को प्रशस्त करेगा।

5.एक सर्वेक्षण के अनुसार,भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग पांच लाख व्यक्तियों की मृत्यु देह-अंगों की अनुपलब्धता के कारण हो जाती है,जिनमें से दो लाख व्यक्ति लीवर की बीमारी और पचास हज़ार व्यक्ति हृदय की बीमारी के कारण मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसके अलावा,लगभग एक लाख पचास हज़ार व्यक्ति किडनी प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करते हैं,जिनमें से केवल पांच हज़ार व्यक्तियों को ही किडनी प्रत्यारोपण का लाभ प्राप्त हो पाता है।

6.इस परिस्थिति में हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि हम लोगों को देह-अंग दान से संबंधित प्रक्रिया को सरल रूप से समझाये और उन्हें देह-अंग दान के लिए प्रोत्साहित करें। उनके स्वाभाविक सवालों के उत्तर देकर उन्हें संवेदनशील व जागरुक बनायें।

7.हम यह भी सुनते हैं कि आर्थिक विपन्नता के चलते व्यक्ति, पैसों के लिए, अपने शरीर के अंगों जैसे कि लीवर,किडनी को अवैध देह-अंग बाजार में बेचने पर मजबूर हो जाते हैं। यह निंदनीय है,अविश्वसनीय है और अस्वीकार्य है। अगर हम सब मानवहित में,देह-अंग दान का स्वैच्छिक संकल्प लें तो अवैध देह-अंग बाजार स्वयं ही समाप्त हो जाएगा।

8.मुझे प्रसन्नता है कि दधीची देह दान समिति ने भी इस संदर्भ में अच्छे प्रयत्न किये हैं। मुझे बताया गया है कि समिति अब तक179लोगों की पूरी देह दिल्ली-एनसीआर के मेडिकल संस्थानों को दान कर चुकी है। मैं यह सुनकर अभिभूत हुआ कि आठ हजार लोगों ने समिति के साथ देह-अंग दान करने का संकल्प लिया है। यह संपूर्ण देश के लिए प्रेरणाकारी है।

9.मुझे ज्ञात है कि कई और सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाएं भी इस अत्यंत सराहनीय कार्य से जुड़ी हैं। इन संस्थाओं के अलावा मैं चिकित्सकों, शिक्षा संस्थानों,शिक्षकों तथा धर्म गुरुओं से भी देह-अंग दान के प्रति जन-समाज में जागरूकता फैलाने की अपील करता हूं। उनकी प्रेरणा से शिक्षा संस्थानों में पढ़ रहे सभी छात्र-छात्राएँ और समाज के अन्य वर्गों के लोग देह-अंग दान का महत्व जान पायेंगे। मैं दधीची देह दान समिति और इस विषय से जुड़ी सभी संस्थाओं से आग्रह करूंगा कि वे इस मानव कल्याण रूपी इस यज्ञ में देशव्यापी जागरूकता द्वारा अपना बहुमूल्य योगदान दिनोंदिन बढ़ायें।

10.अब समय आ गया है जब हम सम्पूर्ण समाज व देश को अपना परिवार बनायें एवं हर पीडि़त,दुर्घटनाग्रस्त,बीमार व अपंग व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए निःस्वार्थ भाव से अपने देह अंगों का दान करने का संकल्प लें। यही सही मायने में मानवता की सेवा में एक प्रेरणादायी कदम होगा।

11.एक बार फिर मैं यहां उपस्थित देह-अंग दान संपन्न करने वाले सभी परिवारों का अभिनंदन करता हूं। साथ ही यहां उपस्थित देह-अंग दान का संकल्प लेने वाले सभी प्रतिभागियों की भी प्रशंसा करता हूं।

12.सर्वे सन्तु निरामयाःयानि सभी लोग स्वस्थ रहें। इसी आदर्श पर चलते हुए हम एकस्वस्थ सबल भारतके निर्माण के लिए दृढ़प्रतिज्ञा करें।

धन्यवाद

जय हिन्द!

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